शनिवार, 19 अगस्त 2017

तुम रहने दो..

मैं तृषित और तुम कृपण युगों-युगों से,
कैसे देख पाओगे नेह दृगों के..
तुम रहने दो..
तुम से मुहब्बत ना हो पाएगी..

साक्षी संदर्भ हैं प्रीत क्षणों के,
कैसे गाओगे वो गुंजित गीत मनों के
तुम रहने दो..
तुम से मुहब्बत ना हो पाएगी

जो मुग्ध हो गुम तुम स्वयं पर यों,
कैसे देख पाओगे छू कर मन को?
तुम रहने दो...
तुम से मुहब्बत न  हो पाएगी...

क्यों कर समझोगे दर्द दियों के,
हो बंधक तुम अंश-हरों के
कैसे प्रीत निभा पाओगे?
तुम रहने दो..
तुम से मुहब्बत ना हो पाएगी..

उलझे रहते हो अंकों शब्दों में
बेरहम चांदी के टुकड़ों में
कैसे समझोगे मन छंदों के
तुम रहने दो..
तुम से मुहब्बत ना हो पाएगी ..

अक्षिणी

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

सनद रहे..

मुफ्त नहीं है आज़ाद हिन्द की आज़ाद हवाएं,
सनद रहे..

कितनी माँओं ने थे लाल गँवाए,
कितने वीरों ने थे प्राण गँवाए..
इस आजादी की वेदी पर,
अनगिन हमने शीश चढ़ाए..
सनद रहे..

कंधों ने था जोर लगाया,
फंदों ने था जोश जगाया..
रक्त बहा जब दरिया हो कर,
तब जाकर हमने आजादी पाई
बातों से कब आजादी आई ?
ये याद रहे..

जीत अभी ये आधी है,
संघर्ष अभी भी बाकी है..
भारत वीरों,अब हम होश में आए
अनमोल ये आजादी खो ना जाए..
ये ध्यान रहे..

अधिकारों की बात करें जब,
कर्त्तव्यों को याद करें हम..
साथ जुटें और साथ बढ़ें अब..
फिर नया हिन्दुस्तान बनाएं..
भारत को फिर महान बनाएं..
सनद रहे..

अक्षिणी

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

सनद रहे..

मुफ्त नहीं हैं आज़ाद हिन्द की आज़ाद हवाएं
सनद रहे..
अधिकारों के साथ कर्त्तव्य ना हम भूल जाएं,
सनद रहे..
ये आज़ादी मुफ्तख़ोरों के लिए नही हैं,
सनद रहे..
ये आज़ादी किसी एक धर्म या सम्प्रदाय की नहीं है,
सनद रहे.
ये आज़ादी हमारी कम और आने वाले पीढ़ियों की ज्यादा है,
सनद रहे..
दहलीज पे आज भी राह तकती हैं जो निगाहें,
आने की कह वो लौट ना पाए..
सनद रहे..
फूल मस्तक के शहीदों ने चढ़ाए,
तब कहीं हम आज़ाद हो पाए..
सनद रहे..
अक्षिणी

सोमवार, 14 अगस्त 2017

ये भेड़िए..

ये वहशी भेड़िए हैं इनका क्या ?
रक्त पिपासु हैं इन्हें बच्चों से क्या?
छीन लेते हैं मुँह से रोटी,
नोच खाते हैं बोटी बोटी..
चील कौवों से झपटते हैं,
खून से चलती हैं इनकी रोटी..
ये वहशी भेड़िए हैं इनका क्या..

ये जितों को ज़िंदा जलाएं,
और मुर्दों पे दाँव लगाए..
लाशों पे ये घर द्वार बनाए,
कब्रों पे नये गाँव बसाए..
ये लालच के अंधे हैं, इन्हें बच्चों से क्या..

चुडैल डायन भी छोड़ दें घर कुछ,
ये लूट लिया करते हैं सब कुछ,
नरभक्षी पिशाच हैं ये सारे,
भूत भी शर्मिंदा हैं इनके आगे..
गिध्दों कौवों से बदतर सारे,इनका क्या..

ये साँसों की हवाएं चुराएं,
बच्चों बूढ़ों को ये कच्चा चबाएं..
भट्टों सी सुलगती आग हैं ये,
इंसानियत पे दाग हैं ये..
ये आधुनिक दरिंदे हैं इन्हें बच्चों से क्या..

अक्षिणी




लालों में लाल..

मन मेरा स्तब्ध खड़ा है,
निष्ठुर ये प्रारब्ध बड़ा है..

पीर मैं अपनी दिखलाऊं कैसे,
टीस ये मन की कह पाऊं कैसे..
लालों में वो लाल था ऐसे,
गालों में ज्यों गाल हो जैसे..

देख के उसको मन ऐसा जागा,
बाँध लिया फिर मोह का धागा..
हाथों से नहलाया उसको,
पोरों से सहलाया उसको..

महका करता था घर भर में,
अटका रहता था मेरी नजर में..
हाय री किस्मत लूटा ऐसा,
हाथ किसी का छूटा जैसे..

उसकी छवि को भूल न पाऊं,
कण कण में मैं ढूंढ न पाऊं..
बीज बीज वो ऐसा छूटा,
वो लाल टमाटर ऐसा फूटा..
अक्षिणी

बुधवार, 9 अगस्त 2017

कृष्ण कौन..

प्रसंगवश: सुदामा को घोर विपन्नता की स्थिति में भी कृष्ण स्मरण करने पर उनकी पत्नि के प्रश्न का उत्तर..

कृष्ण कृष्ण जो जपत हो तुम,
कुछ समझाओ ये कृष्ण कौन..?

री भोली बावरी तू कृष्ण न जानि,
निरी गंवार तू कृष्ण की लीला ना जानि..

कर्म हैं, धर्म हैं प्रभु कृष्ण सदा,
धर्म का मर्म है प्रभु कृष्ण सदा..

मनमोहिनी अधरों पर मुस्कान कृष्ण के,
सब जानते हैं भगवान कृष्ण हैं..

मन में बसी जो प्रीत कृष्ण की,
जग में चली जो रीत कृष्ण की..

सब ग्वालों में बसे बालकृष्ण हैं,
हर युग के अर्जुन के साथ कृष्ण हैं..

राधा का श्रृंगार कृष्ण से,
उद्धव का संसार कृष्ण हैं..

गोकुल के गोपाल कृष्ण तो
मथुरा के भगवान कृष्ण हैं..

कर्ता हैं कृष्ण और काम भी कृष्ण हैं,
हैं मूल कृष्ण और प्रतान भी कृष्ण हैं..

कुंज गलियन में धेनू संग मीत कृष्ण हैं,
यमुना तट पर वेणू का संगीत कृष्ण हैं..

री बावरी कृष्णमय संसार सारा ,
कण-कण में प्राण का आधार कृष्ण है..

अक्षिणी

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

फितरत..

अंधेरे ने यहां बदल दी है फितरत अपनी,
स्याहियों को फिज़ा में घोलना छोड़ दिया है..

मज़हबों ने समेट ली है हसरतें अपनी,
नफरतों का ज़हर घोलना छोड़ दिया है..

ज़ुबानों ने चख ली है बूंदें शहद की,
बोलियों ने तीखा बोलना छोड़ दिया है..

नकाबों में छुप गई हैं आबरू सच की,
हकीकतों ने मुंह खोलना छोड़ दिया है..

जिए जा रहे हैं दूर यूं ही शाख पत्तों से,
दरख़्तों ने अब राह जोहना छोड़ दिया है ..

अक्षिणी

बुधवार, 2 अगस्त 2017

कोशिश है कि..

कोशिश है कि हुनर हर हाथ हो,
कुशल हर इंसान हो
और हर हाथ को काम हो..

उद्यमी हो देश अब प्रगति के मार्ग पर,
तकनीक और उद्योग अब ,
देश की पहचान हो..

ज्ञान और विज्ञान के सब
ध्वज हमारे हाथ हैं,
तारों के आकाश तक
अब हमारे नाम हैं,

कर्म अब जो साथ लें तो
धर्म अपने साथ हो..
तकनीक और उद्योग अब,
देश की पहचान हो..

अक्षिणी