बुधवार, 31 मई 2017

काश तुम न होते..

काश तुम न होते ..

तो मैं जी पाती जी भर,
आँखों में भर पाती अंबर..
तुम्हारे साथ जीवन ,
दिन रात की तपन..

मैं बाँध के घुँघरू नाच न पाऊँ,
दूर क्यूँ तुमसे भाग न पाऊँ
बात ये तुमसे कह न पाऊँ,
साथ ये तेरा सह न पाऊँ..

काहे बाँधा व्यर्थ का बँधन,
चुभता है अब ये आलिंगन..
दिया नहीं जब कोई आमंत्रण..
रहने दो ये अनचाहा आरोपण..

चिड़िया सी मैं चुगने वाली,
तितली सी मैं उड़ने वाली,
छीन लिए हैं रंग जो तुमने,
नोच लिए हैं पँख जो तुमने..

उड़ना चाहूं, उड़ ना पाऊं,
चाहे जितना जोर लगाऊं..
काहे खेला मुझसे ये छल?
काहे उलझे मुझसे आकर ?

घुटती साँसे करती लाख जतन,
तुम ना समझो पल पल की घुटन..
निर्मोही निर्मम निर्लज्ज हे मेरे मोटापे..
मुझे छोड़ दो अब..मुँह मोड़ लो अब..

अक्षिणी

मंगलवार, 30 मई 2017

चलते चलते..

चलते - चलते, रुकते - थमते,
झुकते - चुकते, बनते - ठनते,
शब्दों के ताने जुड़ जाएं
और कविता बन जाए..

कड़वी नीम निंबोरी को..
मीठी आम अमोरी को..
चख पाएं तो कह पाएं..
और कविता बन जाए..

गहरी रात अंधेरी हो,
डसती पीर घनेरी हो,
सह जाएं तो कह पाएं..
और कविता बन जाए..

मन कविता सरिता में बह जाए,
और रचिता मुदिता हो मुसकाए,
बह जाएं तो कह जाएं,
और कविता बन जाए..

अक्षिणी

गुरुवार, 25 मई 2017

तीन साल..

आज पूरे हो गए हैं तीन साल..
शुभकामनाएं करें स्वीकार..

बेबाक रहे मोदी जी आप,
बेदाग रही आपकी सरकार..

दुश्मन को हमने दहलाया ख़ूब,
घावों को सबके सहलाया ख़ूब..

'उज्जवला' से चमक रहे गाँव,
'डिमो' का भी अच्छा चला दाँव..

खुल गए हैं सबके खाते,
'जनधन' सब बीमा करवाते..

पारदर्शी रही अपनी सरकार ,
समदर्शी था जिसका व्यवहार..

काबू में आया शेयर बाजार,
देश विदेश में जयजयकार..

बहुत संभल कर चल ली चाल,
फिर दिखाना होगा हमें कमाल..

अब बढ़ाएं थोड़ी रफ़्तार,
म्यान से निकले फिर तलवार..

चुनाव खड़े हैं फिर से द्वार ,
बस बचे हैं दो और साल..

अक्षिणी भटनागर

छोटा सा सवाल..

मरता क्या न करता बेचारा,
डूबते को बस तिनके का सहारा..

सौ साल पुरानी पार्टी का हाल बड़ा बेहाल,
सत्ता से हुए दूर तो लड़खड़ा गई चाल..

छटपटाहट है इनकी देखने वाली,
कैसे फंसे फिर जनता भोली भाली..

कहीं कुछ ना मिला तो बातों का बिछाया जाल,
आतंकियों की आधी रोटी में मिला रहे दाल..

इसके नेताओं का अंदाज़ बड़ा बचकाना है,
चेलों-चमचों का अब भी न कोई ठिकाना है..

आए दिन उठाते रहते हैं ये बवाल,
किसी तरह तो गल जाए फिर दाल..

समझ न पाएं ये छोटा सा एक सवाल,
बासी कढ़ी में फिर कैसे आए उबाल..

अक्षिणी भटनागर

चुक गए हैं आप..

खुशियां मनाएं..
प्रशस्ति तो बनती ही है..
आजादी का खूब उठाया आपने लाभ,
देशद्रोहियों से खूब मिलाया आपने हाथ..
शीर चाय पे कर आए उनसे मुलाकात,
हुर्रियत के हुर्रों से कर आए दिल की बात..

कृपया बताएं..
एक जांच तो बनती ही है..
ये विचार कहाँ से आया,
आपने अपना ख़ब्ती दिमाग लगाया?
या था सोनिया माई ने सुझाया,
आपके कंधों पे रख तीर चलाया..?

और बताएं..
प्रश्न अभी बाकी हैं..
किस हैसियत से की ये अदावत..?
जवान नहीं भूलेगें ये हिमाकत..
आखिर क्यों भूल गए लहू की कीमत,
क्योंकर कर गए ऐसी जुर्रत..?

आगे बताएं..
मज़े की बात है..
मोदी को हटाने की गुहार,
गलत जगह लगा आए हैं जनाब..
बुढ़ौती में मिट्टी फांक आए आप..
देश की जनता जम के लेगी हिसाब..

ज़रा सोचिए..
सच यही है..
सब का उड़ाते आए मज़ाक,
शिक्षा के मंदिरों पे लगाए कई दाग..
घमंड ने कई बार चटाई ख़ाक..
ये हो गया गलत आख़री दाँव..

पचहत्तर के पार,बूढ़ा गए हैं आप..
अब घर बैठिए जनाब..

अक्षिणी भटनागर

सोमवार, 22 मई 2017

कलम..

कलम जो गा सकती थी बदलाव के सौहर,
कलम जो बजा सकती थी इंकलाब का बिगुल,
गद्दारों की औलादों के सेहरे गा रही है..
अमन के चंद कतरों की खातिर,
शोहरत के चंद लम्हों की खातिर,
कलम आज फिर बिक गई है..
कलम जो सजा सकती थी अपने होठों पे दुआ,
कलम जो देख सकती थी छोटी चीजों में खुदा,
शैतान की महफिल में ठुमके लगा रही है..
गैर मुल्कों की रोलियों की खातिर,
चंद सिक्कों की बोलियों की खातिर,
कलम आज फिर बिक गई है,
कलम जो बह सकती थी शहीदों के लहू में,
कलम जो बह सकती थी वतन परस्तों के खूं मे,
कातिलों और हत्यारों के शगुन सजा रही है,
बदनाम हो नाम कमाने की खातिर,
चंद हर्फों के दाम कमाने की खातिर,
कलम आज फिर बिक गई है..
वतनपरस्तों के लहू को लजा रही है,
गैर मुल्कों में मुजरे दिखा रही है,
कलम आज फिर बिक गई है..

अक्षिणी भटनागर

गुरुवार, 18 मई 2017

ख़ता-ए-इश्क..

चाहा तो बहुत कि फिर प्यार करें,
ख़ता-ए-इश्क फिर एक बार करें..

निगाहों से कह दें, कुछ बात करें,
इज़हार करें कुछ,फिर इकरार करें..

ज़ख़्म भरने को हैं बरसों पुराने ,
चलो इक बार फिर एतबार करें..

कह लें अपनी थोड़ी सच्ची-झूठी,
या कि थोड़ा अभी इंतजार करें..

झूठ कहने की आदत नहीं मुझको,
बेहतर है कि फिर ना एतबार करें..

फिर ये सोचें कि क्युं ये बेकार करें,
ख़ुद को दिन रात यूं ही बेकरार करे..

क्यों परेशां हों हम,ख़ुद को परेशान करे
जब ये तय है कि लोग कारोबार करें,

अक्षिणी भटनागर

*on a lighter note..
खामख़्वाह क्यूं दिल बेकरार करें,
फिज़ूल इस दिल को बेजार करें.
जब कि तै है कि सब बाज़ार करें,
काहे मुफ़्त का हम व्यापार करें..

मंगलवार, 16 मई 2017

भोर की डोली..

रात की मृत्यु से सीखें,
जागती किरणों को सींचें.

बन सजल सूरज के घोड़े,
भोर की डोली को खींचें.

अलसाई आँखों को खोलें,
रोशनी सपनों में भर लें.

तारों की चादर समेटें,
धूप की चुनर को ओढ़ें.

ओस की बूंदों को चूमें,
और धरा की माँग भर दें..

अक्षिणी भटनागर

शुक्रवार, 12 मई 2017

*आप के कीड़े..*


आप के कीड़े कुलबुलाने लगे हैं,
भीतर बाहर बिलबिलाने लगे हैं.
सत्ता की गोंद से चिपके थे सारे,
छत्ते से दूर छिटियाने लगें है..

कुर्सी के पठ्ठे थे सारे के सारे,
सड़कों पे अब गरियाने लगे हैं.
झाडू की सींकों से बँधे ये
इक दूजे को लतियाने लगे हैं..

मलाई के चाटनहारे सब
नया दही जमाने लगे हैं..
भेदी ये सारे के सारे
केजू की लंका ढहाने लगे हैं..

कलई जो उतरी तो
बस छटपटाने लगे हैं..
गिरगिट के ताऊ सब
असली रंग दिखाने लगे हैं

माल पे फेर के झाड़ू ये सारे
जनता से आँखें चुराने लगे हैं..
जिस हाँडी में खाते थे सारे,
चौराहे पे ठिकाने लगाने लगे हैं..

धरने तमाशे इनके सारे
हमें अब गुदगुदाने लगे हैं..
दिल्ली के दिलवालें अब
ठेंगा दिखाने लगे है..

अक्षिणी भटनागर

उल्काएं..

इंतिहा जवाब तो आए थे,सवालों को भाए नहीं.
इंकलाब भी लाए थे, तुम हम समझ पाए नहीं..

है यकीं अगर तो उसे रिहा कर दो,
वो न सही तुम ये वादा वफा कर दो..

यादों वादों का इतना ही फसाना है,
ये जो आएं तो सुकूं छिन जाना है.
इंतिहां मुसीबत का सामां है ये
हमने इन्हें गले ना लगाना है..

छोड़ो भी अब,काहे बैठे हो जमाने को भुलाए..
जाने न मुहब्बत वो,माने ना जो तुम्हारे मनाए..

अक्षिणी भटनागर

गुरुवार, 11 मई 2017

शर्मिंदा..

धन्यवाद महोदया,
आपने ये माना कि आप शर्मिंदा हैं,
होना भी चाहिए..

बात शर्मिंदगी की है,
दूर तलक तो जानी है.
आप जन्म ले कर शर्मिंदा हैं और
ये धरती आप को जन्म देकर शर्मिंदा है..

मौलवियों के मशवरों पर चलें आप,
और वतन ढोए आप के पाप..
फिर शर्मिंदा भी हों आप..
ये कहाँ का इंसाफ?

सच तो ये है कि हम शर्मिंदा हैं,
कि आप से रीढ़विहीन हमारे नेता हैं,
सुभाष का बंगाल शर्मिंदा हैं..
क्रांति के आह्वान शर्मिंदा हैं,
भूत, भविष्य, वर्तमान शर्मिंदा है..

आप की ज्यादतियों पर
बंगाल का हर जवान शर्मिंदा हैं..
आप के आचार विचार पर
देश का संविधान शर्मिंदा है..

आप क्यों हैं शर्मिंदा ?
आपको भारतीय कहने वाला
विधान शर्मिंदा है,
आपको चुना,
पूरा पश्चिम बंगाल शर्मिंदा है..

अक्षिणी भटनागर

बुधवार, 10 मई 2017

अंदाज़

तदबीरों से अरमान सँवरते देखे हैं,
तकरीरों से अल्फाज़ सुलगते देखे हैं,
तकदीरें बदले जो पहलू तो
तस्वीरों के अंदाज़ बदलते देखे  हैं.

अक्षिणी भटनागर

मंगलवार, 9 मई 2017

महाराणा..

काँटों और उजाड़ों में
बीहड़ों और पहाड़ों में
वो मान धरा का रखने वाला
था मेवाड़ धरा का रखवाला

तपती गर्मी के अंगारों में
आँधी में और बरसातों में
रजपूती आन पे मरने वाला
हिन्द की शान पे मिटने वाला

तीरों और तलवारों से
भालों और कटारों से
खूब लड़ा वो ऊँचे सर वाला
महलों का राणा वो मतवाला

खूब अंधेरों में भटका जो
सिसोदिया सूरज था वो
वो घास की रोटी खाने वाला
एकलिंग को शीश नवाने वाला

आन की खातिर प्राण प्रतापी
शीश दिए शोणित अभिमानी
मुगलों की ताकत तोलने वाला
मेवाड़ का राणा था महाराणा

अक्षिणी भटनागर

शुक्रवार, 5 मई 2017

सुबहों को..

सुबहों को उजाले खिल जाएं तो
शामों को निवाले मिल जाएं..

चेहरों की नकाबें हट जाएं तो,
शिकवों के खजाने खुल जाएं..

जख़्मों के बहाने मिल जाएं तो,
मरहम की दुकानें खुल जाएं..

आहों के समंदर धुल जाएं तो,
खुशियों के तराने बन जाएं..

शब्दों की कटारें तन जाएं तो,
बातों के फसाने बन जाए..

अक्षिणी भटनागर

मंगलवार, 2 मई 2017

मगर..

ज़िंदा तो है मेरा आप मगर जीता नहीं है,
होता तो है सरेअक्स मगर मिलता नहीं है..

बुनता तो है कुछ ख़्वाब,मगर चुनता नहीं है,
सहता तो है हर बात मगर कहता नहीं है..

उलझा तो है ये वक्त मगर ठहरा नहीं है,
महका तो है कुछ देर मगर बहका नहीं है..

चलता तो है मेरे साथ मगर दिखता नहीं है,
सुलगा तो है हर बार मगर जलता नहीं है..

सहमा सा है एतबार मगर बिखरा नहीं है,
करता तो है इकरार मगर रुकता नहीं है..

अक्षिणी भटनागर