बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

बेटियाँ..


बारहा हाशियों पे
उभर आतीं हैं बेटियाँ..
तपती हैं अंगारों पे,
निखर आतीं हैं बेटियाँ..
जूझती हैं जी भर ,
सँवर जाती हैं बेटियाँ..
हादसों का दौर हो,
मुश्किलों का शोर हो,
हर बार उबर आती हैं..
जो चोट हो अपनों पे तो,
हद से गुज़र जाती हैं बेटियाँ..

अक्षिणी

दिल्ली के मालिक..

दिल्ली के मालिक,
चप्पल छाप बिगड़े नवाब,
आम आदमी का झंडा,
ले कर आए थे आप..?
भूल गए..?

दिल्ली के सरकार ज़रा होश में आएं आप,
ये दिल्ली है जनाब ठरकी सुलतान.
किसी एक की हुई न कभी,
कई आए राजा राजे या बादशाह..

दिल्ली के मालिक,
ज़रा होश में आएं आप
आहिस्ता बोलें झूठों के सरदार,
कहीं सुन ना लें असली सरकार

#दिल्ली_मालिक

अक्षिणी

बनावटी लोग..


झूठे दिखावटी लोग,
मतलबी बनावटी लोग..
बस दूर से अच्छे लगते हैं,
ये नकली सजावटी लोग..

अक्षिणी

Take time..

Take time to sit back,
Take time to look back,
Take time to get back....

Take time sit back,
Take time to look back,
Take time to hit back..

Take time to sit back,
Take time to write back,
Take time to get back...

Akshini

उजालों से..


सुबह कभी रुकती नहीं ,
रात के हवालों से..
अंधेरों की हैसियत ही क्या ?
जो रार ले उजालों से..

अक्षिणी

The child in me..


Once he smiled,
Once he played,
had some time..
Once he had a life..

The child in me,
The wild in me,
Lost it's say,
Gone day by day..

Once he talked,
Once he rocked,
Had some sway,
Lost the will to play,

The child in me,
The wild in me,
Had a very little say,
Gone far away..

#the child in me..

Akshini

आस

ये आस भी कमबख्त चीज़ है बड़ी खास,
भूलने ही नहीं देती ज़िंदा होने का अहसास..

ये आस भी कमबख़्त चीज़ है बड़ी खास,
मंजिलें दिखाई देती हैं कहीं आस-पास..

ये आस भी कमबख़्त चीज़ बड़ी है खास,
सुबह आएगी ज़रूर,रात कितनी हो उदास..

ये आस भी कमबख़्त चीज़ बड़ी है खास
आदमी हारता नहीं,करता रहता है प्रयास..

जब तक चलेगी साँस,ज़िंदगी आस दर आस,
इसीलिए कहा न ये आस चीज़ है बड़ी खास..
#आस

अक्षिणी

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

काश..

संग तेरे संग से ढल जाते तो
जमाने कई होते,
हम तेरे रंग में रंग जाते तो
फसाने कई होते..

अक्षिणी ..

रविवार, 24 सितंबर 2017

प्रशस्ति

इतनी प्रशस्ति न हमारी गाएं,
धनिए के झाड़ पे ना हमें चढ़ाएं...
हम वो नहीं जो आपकी बातों में आएं..
और अपनी असलियत को भूल जाएं..
कृपया इतना ना हमको मख्खन लगाएं,
कि हम सिरे से ही फिसल जाएं..
अपने शब्दों को थोड़ा लगाम लगाएं,
कोई आईना बन हमें चेहरा दिखाएं..
यूं धरातल पे हम खुद को बिठाएं,
कहीं ये तारीफें ना हमें उड़ाएं..
इतनी मीठी ना बातें बनाएं,
कि हम फूल के कुप्पा हो जाए..
मधुमेह से खुद को बचा न पाएं,
ऐसी बातों से शक्कर बढ़ती जाए..
इतनी प्रशस्ति ना हमारी गाएं,
कि प्रशस्ति पे हम कविता कह जाएं..

अक्षिणी

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

मुखर मौन ..

कुछ कह पाती,कुछ ना कह पाती,
बिन कहे तुमसे ना रह पाती हूँ...
दर्द ये अपना ना सह पाती हूँ

स्नेह की पराकाष्ठा वहीं
जहाँ शब्दों की सीमा खत्म हो,
मैं तुम्हारे मौन को कह दूं ,
तुम मेरी अनकही को सुन लो..

दुख को बाँध के शब्दों में,
मैं एक सरिता सी बह जाती हूँ..
मन को साध के छंदों में,
फिर एक कविता कह जाती हूँ..

अक्षिणी

बुधवार, 20 सितंबर 2017

आह्वान..

फिर करें शक्ति का आह्वान हम..
बेड़ियों को तोड़ दें हम,
रूढ़ियों को छोड़ दें हम,
फिर करें शक्ति का आह्वान हम..
भारती को दें स्वस्ति का उपहार हम..
अजन्मी बेटियों को दें अभयदान हम..

बुद्धि का वरदान दें माँ और
सिद्धि का संस्कार दें माँ..
फिर करें शक्ति का आह्वान हम..
नारी शक्ति को दें उचित सम्मान हम..
यूं करें सार्थक नव दूर्गा का त्योंहार हम..
फिर करें शक्ति का आह्वान हम..

अक्षिणी

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

आखिर कौन..

आखिर कौन हैं ये,
हमारे आपके बीच हमसे ही दिखते,
इंसानी खाल में छुपे,नरभक्षी पिशाच,
जो बच्चों का शिकार करते हैं,
अपनी हवस के लिए..

आखिर कौन हैं ये
कैसे छुपे रह जाते हैं क्युं समय पर पकड़ मे
नहीं आते ये कानून की पैदायशी जानवर हैं या
आदमी से अभी जानवर बने हैं?

आखिर कौन हैं वो लोग?
वासना के वशीभूत,
कैसे स्वयं का ज़मीर नहीं जगा पाते हैं?
कैसे शीशे में खुद को चेहरा दिखा पाते हैं?

आखिर कौन हैं ये लोग
क्या सांपों से भी गए गुजरे हैं
बाप नहीं होते हैं ये या औलाद नहीं होते हैं
ये सब कर कैसे जी पाते हैं?

आखिर कौन हैं ये लोग
जाने क्या पा जाते हैं कैसा सुख पा जाते हैं
मासूमों की हँसी कुचलने वाले ये लोग
जाने कैसे जी पाते हैं?

अक्षिणी

कितनी..

कितनी बात बना पाएंगे
कितनी पीर भुला पाएंगे
कितने घाव छुपा पाएंगे
कितनी टीस भुला पाएंगे

इस मैले आंचल के
कितने दाग मिटा पाएंगे
इस भूले आँगन के
कितने भाग जगा पाएंगे

कितनी प्रीत जगा पाएंगे
कितनी रीत निभा पाएंगे
इस हरजाई मन के अपने
कितने गीत सुना पाएंगे..

कितने दाँव लगा पाएंगे
कितने वार बचा पाएंगे
इस जीवन नैया को हम,
कितने पार लगा पाएंगे..

अक्षिणी

बुधवार, 13 सितंबर 2017

मेरी बोली..

चाहों को ये स्वर दे ऐसे,
मनोभावों को वर ले जैसे..

बोलों को ये वाणी कर दे,
भीगी आँख से पानी हर ले..

सपनों में ये रंग भरे और,
वचनों से ये दंग करे यूं..

हर भाषा को अपनाए ऐसे,
सखियों संग इठलाए जैसे..

हिन्द का गौरव गान है हिन्दी,
हर हिन्दी का अभिमान है हिन्दी..

#हिन्दी_दिवस

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

दीवारों के कान..

सच है कि दीवारों के कान हुआ करते हैं,
जो सुन सुन कर हलकान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान बड़े बेईमान हुआ करते हैं,
सबसे ज्यादा ये परेशान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान कितने हैरान हुआ करते हैं,
झू

ठी-सच्ची लगा कर सम्मान लिया करते हैं..

दीवारों के ये कान..
ना कभी किसी पे मेहरबान हुआ करते हैं,
इनके न कभी कोई भगवान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान
बेचारे कितने नादान हुआ करते हैं,
सबसे पहले यही कुर्बान हुआ करते हैं..

अक्षिणी

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

सिकुड़ते मौसम..

कुदरत की नैमत को
अब भी नहीं माने हैं हम,
आदमी की ज़ुर्रत को
कहाँ पहचाने हैं हम..

अब भी ना संभाल पाए,
इस मेहर को गर..
रोक ना पाएंगे कुदरत के
फिर कहर को हम..

है वक्त अभी, जागें,
कि सँभल जाएं हम..
अपने ही नशे में गाफिल,
होश में आए हम..

बस हमारे नहीं हैं ये,
बदलते सिकुड़ते मौसम,
अगली पीढ़ी को आखिर
क्या सौंप जाएंगे हम..?

अक्षिणी

शनिवार, 26 अगस्त 2017

आस्था

वो जो राम और रहीम हुआ चाहते थे,
आदमी हो नहीं पाए ख़ुदा हुआ चाहते थे..

झूठी आस्था के अंधे ये लोग,
देश का दामन दागदार किये जाते हैं,
मनुष्य नहीं बन पाए जो लोग,
उन्हें भगवान किए जाते हैं..

आज फिर देश का दामन शर्मसार हुआ है,
आज फिर चली हैं गोलियाँ अपनों पर..
फिर लग गया है एक और प्रश्न चिन्ह,
समृद्ध और खुशहाल भारत के सपनों पर..

अक्षिणी

शनिवार, 19 अगस्त 2017

तुम रहने दो..

मैं तृषित और तुम कृपण युगों-युगों से,
कैसे देख पाओगे नेह दृगों के..
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी..

साक्षी संदर्भ हैं प्रीत क्षणों के,
कैसे गाओगे वो गुंजित गीत मनों के
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी

जो मुग्ध हो गुम तुम स्वयं पर यों,
कैसे देख पाओगे छू कर मन को?
तुम रहने दो...
तुमसे मोहब्बत न  हो पाएगी...

क्यों कर समझोगे दर्द दियों के,
हो बंधक तुम अंश-हरों के
कैसे प्रीत निभा पाओगे?
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी..

उलझे रहते हो अंकों शब्दों में
बेरहम चांदी के टुकड़ों में
कैसे समझोगे मन छंदों के
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी ..

अक्षिणी

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

सनद रहे..

मुफ्त नहीं है आज़ाद हिन्द की आज़ाद हवाएं,
सनद रहे..

कितनी माँओं ने थे लाल गँवाए,
कितने वीरों ने थे प्राण गँवाए..
इस आजादी की वेदी पर,
अनगिन हमने शीश चढ़ाए..
सनद रहे..

कंधों ने था जोर लगाया,
फंदों ने था जोश जगाया..
रक्त बहा जब दरिया हो कर,
तब जाकर हमने आजादी पाई
बातों से कब आजादी आई ?
ये याद रहे..

जीत अभी ये आधी है,
संघर्ष अभी भी बाकी है..
भारत वीरों,अब हम होश में आए
अनमोल ये आजादी खो ना जाए..
ये ध्यान रहे..

अधिकारों की बात करें जब,
कर्त्तव्यों को याद करें हम..
साथ जुटें और साथ बढ़ें अब..
फिर नया हिन्दुस्तान बनाएं..
भारत को फिर महान बनाएं..
सनद रहे..

अक्षिणी

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

सनद रहे..

मुफ्त नहीं हैं आज़ाद हिन्द की आज़ाद हवाएं
सनद रहे..
अधिकारों के साथ कर्त्तव्य ना हम भूल जाएं,
सनद रहे..
ये आज़ादी मुफ्तख़ोरों के लिए नही हैं,
सनद रहे..
ये आज़ादी किसी एक धर्म या सम्प्रदाय की नहीं है,
सनद रहे.
ये आज़ादी हमारी कम और आने वाले पीढ़ियों की ज्यादा है,
सनद रहे..
दहलीज पे आज भी राह तकती हैं जो निगाहें,
आने की कह वो लौट ना पाए..
सनद रहे..
फूल मस्तक के शहीदों ने चढ़ाए,
तब कहीं हम आज़ाद हो पाए..
सनद रहे..
अक्षिणी

सोमवार, 14 अगस्त 2017

ये भेड़िए..

ये वहशी भेड़िए हैं इनका क्या ?
रक्त पिपासु हैं इन्हें बच्चों से क्या?
छीन लेते हैं मुँह से रोटी,
नोच खाते हैं बोटी बोटी..
चील कौवों से झपटते हैं,
खून से चलती हैं इनकी रोटी..
ये वहशी भेड़िए हैं इनका क्या..

ये जितों को ज़िंदा जलाएं,
और मुर्दों पे दाँव लगाए..
लाशों पे ये घर द्वार बनाए,
कब्रों पे नये गाँव बसाए..
ये लालच के अंधे हैं, इन्हें बच्चों से क्या..

चुडैल डायन भी छोड़ दें घर कुछ,
ये लूट लिया करते हैं सब कुछ,
नरभक्षी पिशाच हैं ये सारे,
भूत भी शर्मिंदा हैं इनके आगे..
गिध्दों कौवों से बदतर सारे,इनका क्या..

ये साँसों की हवाएं चुराएं,
बच्चों बूढ़ों को ये कच्चा चबाएं..
भट्टों सी सुलगती आग हैं ये,
इंसानियत पे दाग हैं ये..
ये आधुनिक दरिंदे हैं इन्हें बच्चों से क्या..

अक्षिणी




लालों में लाल..

मन मेरा स्तब्ध खड़ा है,
निष्ठुर ये प्रारब्ध बड़ा है..

पीर मैं अपनी दिखलाऊं कैसे,
टीस ये मन की कह पाऊं कैसे..
लालों में वो लाल था ऐसे,
गालों में ज्यों गाल हो जैसे..

देख के उसको मन ऐसा जागा,
बाँध लिया फिर मोह का धागा..
हाथों से नहलाया उसको,
पोरों से सहलाया उसको..

महका करता था घर भर में,
अटका रहता था मेरी नजर में..
हाय री किस्मत लूटा ऐसा,
हाथ किसी का छूटा जैसे..

उसकी छवि को भूल न पाऊं,
कण कण में मैं ढूंढ न पाऊं..
बीज बीज वो ऐसा छूटा,
वो लाल टमाटर ऐसा फूटा..
अक्षिणी

बुधवार, 9 अगस्त 2017

कृष्ण कौन..

प्रसंगवश: सुदामा को घोर विपन्नता की स्थिति में भी कृष्ण स्मरण करने पर उनकी पत्नि के प्रश्न का उत्तर..

कृष्ण कृष्ण जो जपत हो तुम,
कुछ समझाओ ये कृष्ण कौन..?

री भोली बावरी तू कृष्ण न जानि,
निरी गंवार तू कृष्ण की लीला ना जानि..

कर्म हैं, धर्म हैं प्रभु कृष्ण सदा,
धर्म का मर्म है प्रभु कृष्ण सदा..

मनमोहिनी अधरों पर मुस्कान कृष्ण के,
सब जानते हैं भगवान कृष्ण हैं..

मन में बसी जो प्रीत कृष्ण की,
जग में चली जो रीत कृष्ण की..

सब ग्वालों में बसे बालकृष्ण हैं,
हर युग के अर्जुन के साथ कृष्ण हैं..

राधा का श्रृंगार कृष्ण से,
उद्धव का संसार कृष्ण हैं..

गोकुल के गोपाल कृष्ण तो
मथुरा के भगवान कृष्ण हैं..

कर्ता हैं कृष्ण और काम भी कृष्ण हैं,
हैं मूल कृष्ण और प्रतान भी कृष्ण हैं..

कुंज गलियन में धेनू संग मीत कृष्ण हैं,
यमुना तट पर वेणू का संगीत कृष्ण हैं..

री बावरी कृष्णमय संसार सारा ,
कण-कण में प्राण का आधार कृष्ण है..

अक्षिणी

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

फितरत..

अंधेरे ने यहां बदल दी है फितरत अपनी,
स्याहियों को फिज़ा में घोलना छोड़ दिया है..

मज़हबों ने समेट ली है हसरतें अपनी,
नफरतों का ज़हर घोलना छोड़ दिया है..

ज़ुबानों ने चख ली है बूंदें शहद की,
बोलियों ने तीखा बोलना छोड़ दिया है..

नकाबों में छुप गई हैं आबरू सच की,
हकीकतों ने मुंह खोलना छोड़ दिया है..

जिए जा रहे हैं दूर यूं ही शाख पत्तों से,
दरख़्तों ने अब राह जोहना छोड़ दिया है ..

अक्षिणी

बुधवार, 2 अगस्त 2017

कोशिश है कि..

कोशिश है कि हुनर हर हाथ हो,
कुशल हर इंसान हो
और हर हाथ को काम हो..

उद्यमी हो देश अब प्रगति के मार्ग पर,
तकनीक और उद्योग अब ,
देश की पहचान हो..

ज्ञान और विज्ञान के सब
ध्वज हमारे हाथ हैं,
तारों के आकाश तक
अब हमारे नाम हैं,

कर्म अब जो साथ लें तो
धर्म अपने साथ हो..
तकनीक और उद्योग अब,
देश की पहचान हो..

अक्षिणी

बुधवार, 26 जुलाई 2017

ये बरखा का मौसम...

ये अलसाई सुबह ,ये बरखा का मौसम,
ये हल्की सी रिमझिम,ये बूंदों की सरगम,
लो गहराया बादल, वो लहराया सावन..

वो भीगी सी रातें,वो सावन की यादें,
वो उलझी सी बातें ,वो आवन के वादे,
यूं पलकों पे ठहरी वो भीनी सी शबनम..

ये बरखा का मौसम,ये बूंदों की सरगम..

वो ठहरा सा सावन,वो महका सा तन मन,
वो थिरका सा नर्तन, वो बूंदों की चिलमन..
वो बरसा यूं बादल,जो बहका वो आंचल...

ये बरखा का मौसम, ये बूंदों की सरगम..

अक्षिणी

सोमवार, 24 जुलाई 2017

देख रहे हैं..


कुछ इस कदर हो के बेखबर देख रहे हैं..
इस नज़र में है कितना असर देख रहे हैं..

मुश्किल थे जो तनहा सफर तेरे बगैर ,
सहमे हुए से पहर दो पहर देख रहे हैं..

वो उठाता गया जमाने के दीवार-ओ-दर,
हो चला है खुद दर-ब-दर देख रहे हैं..

उठने को है  जनाजा वफाओं का अब,
उन तक पहुंची नहीं खबर,देख रहे हैं..

कतरों में जो हासिल था यादों का ज़हर,
होने लगा है वो बेअसर ,देख रहे हैं..

अक्षिणी

चेहरा...


जिद है कि फिर वही चेहरा दिखाई दे,
कमबख़्त वक्त फिर कहीं ठहरा दिखाई दे..

हैरां हैं इन दिनों आईना देख के मुझे..
मेरे चेहरे में अब तेरा चेहरा दिखाई दे..

ओढ़ लेते हैं मुस्कानें सरे आईना हम,
डर है अपना न कहीं चेहरा दिखाई दे..

अरसे से मुखौटों का इश्तहार है आदमी,
असली ना कोई चेहरा दिखाई दे..

वो सुनता है सबकी,करता है अपनी,
उसका न कभी चेहरा दिखाई दे..

अक्षिणी

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

जीने दो..

इंसानों में मज़हबों को खोजने वालों,
मज़हबों की आदमियत पे नज़र डालो.
जुबानों में नफरतों को घोलने वालों,
इंसानों में मुहब्बत की बोलियां डालो.

जीने दो आदमी को कमबख्तों ,
अपनी ये लहू की दुकान हटालो..
न बांटो हमें रंग और राग  में ,
आदमी की जात का सदका उतारो..

आदमी के ख़ौफ से डरो जालिमों,
मजहब का हौवा बनाने वालो..
वक्त-ओ-हालात बदलने को हैं,
ख़ून का सौदा समेटने वालों..

आदमी किसी कैद में रहता नहीं,
उसे फिज़ूल की बंदिशों में न बांधो..
आदमी किसी जुल्म से डरता नहीं,
उसकी हैसियत को कम न जानो..

अक्षिणी

बुधवार, 12 जुलाई 2017

खबर..

आदमी मर जाए तो खबर बनती नहीं,
हो तहलका तभी खबर बननी चाहिए..

हर खबर में सनसनी होनी चाहिए..
हर खबर से खलबली होनी चाहिए..

दाल रोटी की खबर बनती नहीं,
हर खबर अब चटपटी होनी चाहिए..

लाश बच्चों की गिरे तो खबर कैसे बने?
औरतें बिक जाए तो खबर बननी चाहिए..

है खबर बाज़ार में अब कैसे चले,
बिक सके सरकार तो खबर बननी चाहिए..

अब खबर इंसान की चलती नहीं,
हो आदमी हैवान तो खबर बननी चाहिए..

अब अमन की खबर चलती नहीं,
तो मज़हबी शैतान की खबर बननी चाहिए..

ना खबर मिल पाए तो कैसे चले?
खून की होली जलाओ,
आग महफिल में लगाओ,
कुछ खबर बननी चाहिए..

अक्षिणी

शनिवार, 8 जुलाई 2017

वंदन...

गुरु वंदन के नाम पर हे जीवन तुझे प्रणाम,
पाठ तेरे अनमोल सब,आते हर क्षण काम..

अक्षिणी

गुरु..

  1. लख गुरु गुरु सब कोई कहे,
     आज गुरु ना माने कोय.
     जो गुरु गुरुता को साध ले,
     सच में गुरु कहलाय सोई..

  2. गुरु जो साधन मैं चला,
      गुरु ना मिलिया मोई.
      जो सच साधा आज तो,
      जग अपना गुरु होय..

   3. चेला भये घंटाल अब,
       तो गुरु कहां ते पायं.
       गुरु पूनम के नाम पे,
       बस झूठी धोग लगाए..
 
   4. गुरु गुरु अब ना कहो,
       गुरु गाइड भए आज.
       जो गुरु मन से कहें,
       सो गुरु मेंटर होई जाए..
  
    5. गुरु बेचारे गुड़ ही रहे,
        चीनी चेले अपने भये,
        कोचिंग की शुगरफ्री जो आई,
        सब गुरु वेले भये..

       अक्षिणी..
   
   
 

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

जहमत-ए- ज़िंदगी..

यूं ही ज़हमत-ए-ज़िंदगी,
अपनों या परायों के लिए..
यकीनन ज़रूरी है धूप भी,
अपने ही सायों के लिए..

अक्षिणी

सोमवार, 3 जुलाई 2017

मौसम..

नये रंगों में हम ढल जाएं,
मौसम तो बदलते रहते हैं..
बदली राहों पर चल पाएं,
मंजर तो बदलते रहते हैं..

-अक्षिणी

बदलाव..

चुनावी साल है,देश की सरकार बदलने वाली है,   हवाई चाल है,वक्त की दरकार बदलने वाली है..

नये सवाल , नये समीकरण होंगे,
नये आधार , नये अधिकरण होंगे..

चाल जो बदली है तो मोहरे बदले जाएंगे,
आइने बदले हैं तो चेहरे भी बदले जाएंगे..
फिर वादों की नई फसल उगाई जाएगी,
और दावों की नई गज़ल सुनाई जाएगी..

कुछ फूल पिरोए जाएंगे,
कुछ कांटे बोए जाएंगे..

फिर पढ़े जाएंगे मतदाता के कसीदे,
फिर जगाई जाएंगी जनता की उम्मीदें..
आस के कुछ गांव बसाए जाएंगे,
घात के नये दांव लगाए जाएंगे..

नये वादे और इरादे होंगे,
कुछ पूरे कुछ आधे होंगे..

घिसने नये चंदन होंगे,नये सागर नये मंथन होंगे
मलाई नये मख्खन होंगे,बस मठ्ठे बहाए जाएंगे.
मंत्री तो बदलेंगे पर नये संतरी कहां से आएंगे,
तंत्री तो बदलेंगे किंतु नये जंत्री कहां से लाएंगे..

बदलाव, कि चेहरे बदले जाएंगे,
अलगाव के पहरे बदले जाएंगे..

-अक्षिणी

मंगलवार, 27 जून 2017

बरसों..

तेरे नाम को हवाओं से सुना बरसों,
तेरे चेहरे को पानी पे उकेरा बरसों.
चार लम्हों के ज़हर को लाख कतरों में पिया है ,
चंद यादों के सफर को स्याह अंधेरों में जिया है.

-अक्षिणी

रविवार, 25 जून 2017

अंदाज़े बयां..

अंदाज़े-बयां कुछ ऐसा हो,
लफ़्ज़ों से मुहब्बत हो जाए.

हम कह भी सकें वो सुन भी सकें,
और दूर शिकायत हो जाए..

लब खोल भी दें रस घोल भी दें,
मीठी-सी शरारत हो जाए..

हम बोल भी लें वो तोल भी लें,
बातों में बगावत हो जाए..

कुछ हार भी लें कुछ जीत भी लें,
रिश्तों की हिफाजत हो जाए..

-अक्षिणी

शनिवार, 24 जून 2017

ईद हो जाए..

या ख़ुदाया, मेरे हिंद में आज फिर ईद हो जाए..
शीर फिरनी न सही , दाने तो मुफ़ीद हो जाएं ..

वो जो समझें तो मुहब्बत के मुरीद हो जाएं,
जो न समझें तो हिसाबों की रसीद हो जाए..

अक्षिणी

तेरी मर्ज़ी..

तुझ से शिकवा नहीं,न शिकायत कोई,
तू जो चाहे तो बियाबां को समंदर कर दे..
तुझ से गिला है न तुझ पे तोहमत कोई,
तेरी मर्ज़ी है,तू फकीरों को सिकंदर कर दे..

-अक्षिणी

ज़िंदगी..

कमाल की पहेली है ज़िंदगी तू भी ,
तू है कि उलझती नहीं, हम हैं कि सुलझते नही

कमाल की मस्ती है ज़िंदगी तू भी,
तू है कि फिसलती नहीं,हम हैं कि सँभलते नहीं

गज़ब का हुनर है ज़िंदगी तू भी,
तू है कि बिखरती नहीं, हम हैं कि सँवरते नहीं

कमाल की कश्ती है ज़िंदगी तू भी,
तू है कि भटकती नहीं, हम हैं कि अटकते नहीं

गज़ब की कशिश है ज़िंदगी तू भी,
तू है कि कुछ कहती नहीं,हम हैं कि समझते नहीं

अक्षिणी

सफर..

सुबह और शाम का ये सफर,
चलता रहे मन हो के बेखबर..
तेरी रहमत पे हो मुझको यकीं,
मेरी हस्ती पे रहे तेरी नजर..

अक्षिणी

मंगलवार, 20 जून 2017

परवाह क्या..

जो चाह हो तो राह क्या,
और राह हो तो चाह क्या.
धुप से बाँधे जो बंधन,
सायों की परवाह क्या..

अक्षिणी

रविवार, 18 जून 2017

माफ कीजिएगा..

माफ कीजिएगा दोस्तों,
यह नहीं हो पाएगा..
बहुत कोशिश की रात भर,
कि चैन से सो जाएं..
इस उदास मन को भरमाएं,
सीने पे पत्थर रख पाएं..
टूटे दिल को आस बँधाएं,
कोई नया स्वप्न दिखाएं..
कठिन नहीं असंभव है,
इस दंश को भूल पाना..
घर के दामन पे लगे,
इस दाग का धुल पाना..
मदहोशी में ये क्या कर आए,
आँखों में अपनी धुआँ भर आए..
कैसे हो अपना त्राण..?
कौन करे अब कल्याण..?
पाक के हाथों अपनी  हार,
नहीं सही जा रही मेरे यार..
बहुत चाहा कि जी बहलाएं,
क्रिकेट की हार पर,
हाकी की जीत का मरहम लगाएं..
बैडमिंटन में रम जाएं..
कोई कहे इन बल्लाधारियों से,
इन बल्लों से ज़रा कपड़े कूट जाएं..
गेंद को ज़रा तेल पानी पिलाएं..
और विश्व कप ले कर आएं,
पाक के छक्के छुड़ाएं..
फिर हमको मुंह दिखाएं..
शायद तब ये दर्द कम हो पाए..

अक्षिणी

आस के गीत..

अलसुबह जो चाह थी,
शाम तक वो खो गई..
दर्द के कतरे समेटे,
भूख चुप हो सो गई..

कर्ज़ आहें भर रहे थे,
और फर्ज़ सारे डस रहे थे..
फिर शब्द सारे मौन थे,
और अर्थ सारे गौण थे..

रात की चादर लपेटे,
नक्श तारों के नहीं थे..
धुंध के आंचल घनेरे,
लक्ष्य राहों के नहीं थे..

इस हार को जो जीत पाए,
वो नया सूरज उगाए..
फिर आस के जो गीत गाए,
स्वप्न अपने वो जगाए..

अक्षिणी

गुरुवार, 15 जून 2017

जीवन..

Life is a symphony of heart and mind,
a play of right note at the right twine..

हँसता रचता ये जीवन,
मनमानस की सरगम मधुरम्..
मन की लय पर भाव जगाए,
मनोभावों के स्वर अनुपम..

"अक्षिणी"

सोमवार, 12 जून 2017

क्षमा..

ये पूछ रहे हैं किस बात की क्षमा..?
सच भी है ,
बेचारे किस-किस बात की क्षमा माँगे..
1885में स्थापना की,या देश को दिए धोखों की?
1984के रक्तपात की,या शास्त्रीजी की हत्या की?
बोफोर्स घोटाले की या आपात काल की?
देश से गद्दारी की या रक्षासौदों में दलाली की?
गरीबों पे अन्याय की या किसानों पे वार की?
अनगिनत गलतियां हैं..
यदि सबकी माफी माँगने लगे तो
बरसों लगेगें..
और संविधान से बड़ा ग्रंथ बनेगा..
इसलिए क्षमा रहने दो और प्रायश्चित करो..
तुम्हारी क्षमा के लिए समय नहीं है
मां भारती के पास ..
वही कर रही है तुम्हारा हिसाब..
बस बंद होने को है तुम्हारी किताब..

--अक्षिणी

मंगलवार, 6 जून 2017

इज़्तिरार..

इकरार, इज़हार, इनकार, इंतजार,
इक मुसलसल इज़्तिरार है प्यार..

* मुसलसल इज़्तिरार --- Never ending helplessness

अक्षिणी

सह पाएं तो कह पाएं..

कड़वी नीम निंबोरी को,
मीठी आम अमोरी को,
चख पाएं तो कह पाएं..
और कविता बन जाए..

गहरी रात अंधेरी हो,
डसती पीर घनेरी हो,
सह पाएं तो कह पाएं..
और कविता बन जाए..

अक्षिणी..

चिंदियां....

तेरी रहमत पे यकीं है मुझे या रब,
तू जो चाहे तो अंधेरों को उजाले कर दे..
होठों पे हंसी , आंखों में सितारे भर दे,
जख़्म भर दे , भूखों को निवाले कर दे..

आह से वाह तक,
चाह से राह तक.
इतनी सी बस ,
इतनी सी ज़िंदगी..

ये तो दरख़्तों ने लाज रख ली
और हो गए ख़ाक,
बुझ ही जाती वरना ये तीली
इसकी क्या बिसात..

नज़र से नज़र का नज़र को चुराना,
कयामत है उनका यूं बहाने बनाना..

नामुकम्मल है तो सज़दा
किया करते हैं उसके दर पे.
जो अंजाम तक पहुंचते तो,
देखते नहीं नज़र भर के..

क्या रूह का ताना,
क्या ज़िस्म का बहाना,
सब उस से
जुदा हो के जाना...

जिस्म ख्वाहिशों में रहे
या बंदिशों में,
उम्र गुजरी है रूह की
ज़ुम्बिशों में..

अक्षिणी

बुधवार, 31 मई 2017

काश तुम न होते..

काश तुम न होते ..

तो मैं जी पाती जी भर,
आँखों में भर पाती अंबर..
तुम्हारे साथ जीवन ,
दिन रात की तपन..

मैं बाँध के घुँघरू नाच न पाऊँ,
दूर क्यूँ तुमसे भाग न पाऊँ
बात ये तुमसे कह न पाऊँ,
साथ ये तेरा सह न पाऊँ..

काहे बाँधा व्यर्थ का बँधन,
चुभता है अब ये आलिंगन..
दिया नहीं जब कोई आमंत्रण..
रहने दो ये अनचाहा आरोपण..

चिड़िया सी मैं चुगने वाली,
तितली सी मैं उड़ने वाली,
छीन लिए हैं रंग जो तुमने,
नोच लिए हैं पँख जो तुमने..

उड़ना चाहूं, उड़ ना पाऊं,
चाहे जितना जोर लगाऊं..
काहे खेला मुझसे ये छल?
काहे उलझे मुझसे आकर ?

घुटती साँसे करती लाख जतन,
तुम ना समझो पल पल की घुटन..
निर्मोही निर्मम निर्लज्ज हे मेरे मोटापे..
मुझे छोड़ दो अब..मुँह मोड़ लो अब..

अक्षिणी