रविवार, 3 दिसंबर 2017

अथ श्री नेता कथा..

तो भक्त जनों
आज की कथा हम छंद में गाएं,
आपसे अनुरोध है आप ताल मिलाए..

नये भक्तों की भक्ति देख कर देवर्षि घबराए,
शिव भोले भंडारी हैं,कहीं पट ही न जाए..
जल थल सब छोड़ के वायु मार्ग अपनाए,
झट उठा कर वीणा हरि लोक चले आए..

प्रभु संकट है भारी, कुछ करें उपाय,
शिव के द्वारे फिर असुर हैं आए..
हरि सब पीर हरें अब आप बचाएं,
बूझन लागे प्रभु,नारद सब हाल सुनाए..

प्रभु आज के नेता हैं सब कछु कर जाए,
सब बाँट के खाएं तनी लाज न आए..
धनधान्य-धरा ये चारा भी चर जाए
गाय काट के खाय और डकार न लाए..

चहुं ओर आग लगाए,सब नर नारी सताए
महापाप करिके अब नाथ के द्वार पे आए..

शिव भोले भंडारी हैं कहीं पट ही ना जाए..

देख के चिंता नारद की,भगवन तजे विश्राम,
झट से गरूड़ उठाय के चले गिरि कैलास..

नीलकंठ जब समाधि से जागे,
हरि नारद झट से पग लागे..
कैसी विपदा जगत में छाई ,
जो आज ये जोड़ी चली आई..

फिर हरि ने सब विपत्ति सुनाई,
काल के नाथ से गुहार लगाई..
भगवन् नंगे रंगे सियार हैं सारे,
फिर छलने आए हैं आपके द्वारे..

हरि की चिंता देखि के शिव बोले मुसकाय,
शरणागत वत्सल हैं हम,करते सदा सहाय..

वो आज के नेता है,हम आज के ईश्वर,
जैसे होंगे भक्त वैसी कृपा करेंगे उन पर,
ज्ञान भी देंगे उन्हें ध्यान भी देंगे,
बुद्धि शुद्धि का वरदान भी देंगे,

हम काल हैं महाकाल भी हम,
प्राण भी देंगे और त्राण भी देंगे..
जो आए हैं द्वार पे उद्धार करेंगे ..
इटली पठा के फिर श्रीराम करेंगे..

ऐसी वाणी जब शिव सुनाए,
देवर्षि की जान में जान है आई..
प्रभु ने दिया विश्वास
तो हरि चले निजधाम..

बोलो जय श्री राम..

अक्षिणी

बुधवार, 29 नवंबर 2017

जीने का अधिकार

खत्म हुआ इंतजार अब,
है जीने का अधिकार अब
थे जी रहे गुमनाम से,
थी ज़िंदगी बेकार ये

ज्यों नाव बिन पतवार के,
डोलती थी मँझधार में..
ज्यों डोर बिन आकाश में,
एक कटी पतंग हो उड़ान में..

अब मिली पहचान हमको,
जी रहे थे निराधार अब तक..
है नई पहचान अपनी..
है अस्तित्व का उपहार ये

है बहुत आभार तुमको,
जो दे दिया आधार हमको ..
जीत का हथियार हमको,
जीने का आधार हमको..

अक्षिणी

बुधवार, 1 नवंबर 2017

इन दिनों..

दोस्ती मुमकिन नहीं है 'मैं' के मारे,
वक्त के मोहताज हैं साथ सारे इन दिनों..

नींद के आगोश में हैं ख्वाब सारे,
चाहतें चुप सी खड़ी हैं हाथ बाँधे इन दिनों..

चल चलें, छोड़ आएं प्रीत के गीत सारे,
मन को यूँ चुभने लगे हैं मीत सारे इन दिनों..

धूप को मिलती नहीं अब छाँव कोई,
ज़िंदगी आसां नहीं है इस किनारे इन दिनों..

-अक्षिणी

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

Hinduism and Festivals..

Hinduism is the most environmental friendly religion.It believes in co existence with all living and non living beings.
Hindu festivals are designed according to weather cycle.

Sankranti marks Sun's transit to 'Makar'(Capricorn) marking the end of Winter.The days start getting longer.
Lohidi,Pongal,Sankranti the names may differ but these festivals mark the arrival of summers and new crop..

Holi is the spring festival..originated as 'Basantotsava' it marks the arrival of spring..

Chaitra Navratra begins from first day of the solar year.Nine days of fasting provides a period of praying and detox.

Acc to Hindu Calender Rainy season lasts from Jyeshtha to Bhadrapad..Rains leading to moisture,dampness and insects.
Deepawali/Diwali is not just lighting lamps.That's the least and last of it..

Cleaning and preparing houses n surrounding before winters is what Diwali is all about.
Burning of mustard oil diyas help kill the insects bred in Rainy days.Preparing a lot of food for coming days..

Diwali also provides us an occasion to rejuvenate our souls after enduring rains and staying indoors during monsoon..

Goverdhan Pooja is a way to show our gratitude to the livestock..

So no..our festivals are not just a way to strut around in finery and give lessons about environment.

We have a scientific reason behind every ritual which may have been modified through the course of time.

It's a fact.
ऊँ सहनाववतु
सहनोभुनक्तु
सहवीर्यं करवावहै,
तेजस्वीनापतितम्
अस्तु मा विद्विषावहै.
together we protect each other.

Akshini

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

मुहब्बत और ताज..


निशानेइश्क इस ताज में दफन कई राज़ हैं,
वो मुहब्बत ही क्या जो ताज की मोहताज है..

अक्षिणी

In Tune..


Just be in tune with nature's symphony.. you will find your note to play on..

-Akshini

ज़िंदगी..

तुझे याद कर रहे हैं,
तेरी बात कर रहे हैं,
ना मिले ना सही ज़िंदगी,
तेरे बगैर बसर कर रहे हैं..

#ज़िंदगी

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

तेजोमय हो ..

तेजोमय हो,स्वस्तिमय हो,
घर आँगन सब ज्योतिर्मय हो
अंधियारों को दीप्त करे
धनधान्य भरे,अंतर्तम् को दूर करे
यह दीपोत्सव मंगलमय हो..

अक्षिणी

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

दिल्ली के मालिक..

दिल्ली के मालिक,
चप्पल छाप बिगड़े नवाब,
आम आदमी का झंडा,
ले कर आए थे आप..?
भूल गए..?

दिल्ली के सरकार ज़रा होश में आएं आप,
ये दिल्ली है जनाब ठरकी सुलतान.
किसी एक की हुई न कभी,
कई आए राजा राजे या बादशाह..

दिल्ली के मालिक,
ज़रा होश में आएं आप
आहिस्ता बोलें झूठों के सरदार,
कहीं सुन ना लें असली सरकार

#दिल्ली_मालिक

अक्षिणी

बनावटी लोग..


झूठे दिखावटी लोग,
मतलबी बनावटी लोग..
बस दूर से अच्छे लगते हैं,
ये नकली सजावटी लोग..

अक्षिणी

Take time..

Take time to sit back,
Take time to look back,
Take time to get back....

Take time sit back,
Take time to look back,
Take time to hit back..

Take time to sit back,
Take time to write back,
Take time to get back...

Akshini

उजालों से..


सुबह कभी रुकती नहीं ,
रात के हवालों से..
अंधेरों की हैसियत ही क्या ?
जो रार ले उजालों से..

अक्षिणी

The child in me..


Once he smiled,
Once he played,
had some time..
Once he had a life..

The child in me,
The wild in me,
Lost it's say,
Gone day by day..

Once he talked,
Once he rocked,
Had some sway,
Lost the will to play,

The child in me,
The wild in me,
Had a very little say,
Gone far away..

#the child in me..

Akshini

दिल्ली सरकार

आप बेकार..
केजू मक्कार..
झूठी सरकार..
दिल्ली बेजार..
रोए लगातार..
बस कर यार..
दिल्ली सरकार..
गिन कर बंदे चार..
आधे तिहाड़..
आधे लफ्फाड़..
हद है यार..
कैसी सरकार..

अक्षिणी

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

काश..

संग तेरे संग से ढल जाते तो
जमाने कई होते,
हम तेरे रंग में रंग जाते तो
फसाने कई होते..

अक्षिणी ..

बुधवार, 13 सितंबर 2017

मेरी बोली..

चाहों को ये स्वर दे ऐसे,
मनोभावों को वर ले जैसे..

बोलों को ये वाणी कर दे,
भीगी आँख से पानी हर ले..

सपनों में ये रंग भरे और,
वचनों से ये दंग करे यूं..

हर भाषा को अपनाए ऐसे,
सखियों संग इठलाए जैसे..

हिन्द का गौरव गान है हिन्दी,
हर हिन्दी का अभिमान है हिन्दी..

#हिन्दी_दिवस

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

दीवारों के कान..

सच है कि दीवारों के कान हुआ करते हैं,
जो सुन सुन कर हलकान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान बड़े बेईमान हुआ करते हैं,
सबसे ज्यादा ये परेशान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान कितने हैरान हुआ करते हैं,
झू

ठी-सच्ची लगा कर सम्मान लिया करते हैं..

दीवारों के ये कान..
ना कभी किसी पे मेहरबान हुआ करते हैं,
इनके न कभी कोई भगवान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान
बेचारे कितने नादान हुआ करते हैं,
सबसे पहले यही कुर्बान हुआ करते हैं..

अक्षिणी

शनिवार, 26 अगस्त 2017

आस्था

वो जो राम और रहीम हुआ चाहते थे,
आदमी हो नहीं पाए ख़ुदा हुआ चाहते थे..

झूठी आस्था के अंधे ये लोग,
देश का दामन दागदार किये जाते हैं,
मनुष्य नहीं बन पाए जो लोग,
उन्हें भगवान किए जाते हैं..

आज फिर देश का दामन शर्मसार हुआ है,
आज फिर चली हैं गोलियाँ अपनों पर..
फिर लग गया है एक और प्रश्न चिन्ह,
समृद्ध और खुशहाल भारत के सपनों पर..

अक्षिणी

शनिवार, 19 अगस्त 2017

तुम रहने दो..

मैं तृषित और तुम कृपण युगों-युगों से,
कैसे देख पाओगे नेह दृगों के..
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी..

साक्षी संदर्भ हैं प्रीत क्षणों के,
कैसे गाओगे वो गुंजित गीत मनों के
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी

जो मुग्ध हो गुम तुम स्वयं पर यों,
कैसे देख पाओगे छू कर मन को?
तुम रहने दो...
तुमसे मोहब्बत न  हो पाएगी...

क्यों कर समझोगे दर्द दियों के,
हो बंधक तुम अंश-हरों के
कैसे प्रीत निभा पाओगे?
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी..

उलझे रहते हो अंकों शब्दों में
बेरहम चांदी के टुकड़ों में
कैसे समझोगे मन छंदों के
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी ..

अक्षिणी

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

सनद रहे..

मुफ्त नहीं है आज़ाद हिन्द की आज़ाद हवाएं,
सनद रहे..

कितनी माँओं ने थे लाल गँवाए,
कितने वीरों ने थे प्राण गँवाए..
इस आजादी की वेदी पर,
अनगिन हमने शीश चढ़ाए..
सनद रहे..

कंधों ने था जोर लगाया,
फंदों ने था जोश जगाया..
रक्त बहा जब दरिया हो कर,
तब जाकर हमने आजादी पाई
बातों से कब आजादी आई ?
ये याद रहे..

जीत अभी ये आधी है,
संघर्ष अभी भी बाकी है..
भारत वीरों,अब हम होश में आए
अनमोल ये आजादी खो ना जाए..
ये ध्यान रहे..

अधिकारों की बात करें जब,
कर्त्तव्यों को याद करें हम..
साथ जुटें और साथ बढ़ें अब..
फिर नया हिन्दुस्तान बनाएं..
भारत को फिर महान बनाएं..
सनद रहे..

अक्षिणी

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

सनद रहे..

मुफ्त नहीं हैं आज़ाद हिन्द की आज़ाद हवाएं
सनद रहे..
अधिकारों के साथ कर्त्तव्य ना हम भूल जाएं,
सनद रहे..
ये आज़ादी मुफ्तख़ोरों के लिए नही हैं,
सनद रहे..
ये आज़ादी किसी एक धर्म या सम्प्रदाय की नहीं है,
सनद रहे.
ये आज़ादी हमारी कम और आने वाले पीढ़ियों की ज्यादा है,
सनद रहे..
दहलीज पे आज भी राह तकती हैं जो निगाहें,
आने की कह वो लौट ना पाए..
सनद रहे..
फूल मस्तक के शहीदों ने चढ़ाए,
तब कहीं हम आज़ाद हो पाए..
सनद रहे..
अक्षिणी

सोमवार, 14 अगस्त 2017

लालों में लाल..

मन मेरा स्तब्ध खड़ा है,
निष्ठुर ये प्रारब्ध बड़ा है..

पीर मैं अपनी दिखलाऊं कैसे,
टीस ये मन की कह पाऊं कैसे..
लालों में वो लाल था ऐसे,
गालों में ज्यों गाल हो जैसे..

देख के उसको मन ऐसा जागा,
बाँध लिया फिर मोह का धागा..
हाथों से नहलाया उसको,
पोरों से सहलाया उसको..

महका करता था घर भर में,
अटका रहता था मेरी नजर में..
हाय री किस्मत लूटा ऐसा,
हाथ किसी का छूटा जैसे..

उसकी छवि को भूल न पाऊं,
कण कण में मैं ढूंढ न पाऊं..
बीज बीज वो ऐसा छूटा,
वो लाल टमाटर ऐसा फूटा..
अक्षिणी

बुधवार, 9 अगस्त 2017

कृष्ण कौन..

प्रसंगवश: सुदामा को घोर विपन्नता की स्थिति में भी कृष्ण स्मरण करने पर उनकी पत्नि के प्रश्न का उत्तर..

कृष्ण कृष्ण जो जपत हो तुम,
कुछ समझाओ ये कृष्ण कौन..?

री भोली बावरी तू कृष्ण न जानि,
निरी गंवार तू कृष्ण की लीला ना जानि..

कर्म हैं, धर्म हैं प्रभु कृष्ण सदा,
धर्म का मर्म है प्रभु कृष्ण सदा..

मनमोहिनी अधरों पर मुस्कान कृष्ण के,
सब जानते हैं भगवान कृष्ण हैं..

मन में बसी जो प्रीत कृष्ण की,
जग में चली जो रीत कृष्ण की..

सब ग्वालों में बसे बालकृष्ण हैं,
हर युग के अर्जुन के साथ कृष्ण हैं..

राधा का श्रृंगार कृष्ण से,
उद्धव का संसार कृष्ण हैं..

गोकुल के गोपाल कृष्ण तो
मथुरा के भगवान कृष्ण हैं..

कर्ता हैं कृष्ण और काम भी कृष्ण हैं,
हैं मूल कृष्ण और प्रतान भी कृष्ण हैं..

कुंज गलियन में धेनू संग मीत कृष्ण हैं,
यमुना तट पर वेणू का संगीत कृष्ण हैं..

री बावरी कृष्णमय संसार सारा ,
कण-कण में प्राण का आधार कृष्ण है..

अक्षिणी

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

फितरत..

अंधेरे ने यहां बदल दी है फितरत अपनी,
स्याहियों को फिज़ा में घोलना छोड़ दिया है..

मज़हबों ने समेट ली है हसरतें अपनी,
नफरतों का ज़हर घोलना छोड़ दिया है..

ज़ुबानों ने चख ली है बूंदें शहद की,
बोलियों ने तीखा बोलना छोड़ दिया है..

नकाबों में छुप गई हैं आबरू सच की,
हकीकतों ने मुंह खोलना छोड़ दिया है..

जिए जा रहे हैं दूर यूं ही शाख पत्तों से,
दरख़्तों ने अब राह जोहना छोड़ दिया है ..

अक्षिणी

बुधवार, 26 जुलाई 2017

ये बरखा का मौसम...

ये अलसाई सुबह ,ये बरखा का मौसम,
ये हल्की सी रिमझिम,ये बूंदों की सरगम,
लो गहराया बादल, वो लहराया सावन..

वो भीगी सी रातें,वो सावन की यादें,
वो उलझी सी बातें ,वो आवन के वादे,
यूं पलकों पे ठहरी वो भीनी सी शबनम..

ये बरखा का मौसम,ये बूंदों की सरगम..

वो ठहरा सा सावन,वो महका सा तन मन,
वो थिरका सा नर्तन, वो बूंदों की चिलमन..
वो बरसा यूं बादल,जो बहका वो आंचल...

ये बरखा का मौसम, ये बूंदों की सरगम..

अक्षिणी

सोमवार, 24 जुलाई 2017

देख रहे हैं..


कुछ इस कदर हो के बेखबर देख रहे हैं..
इस नज़र में है कितना असर देख रहे हैं..

मुश्किल थे जो तनहा सफर तेरे बगैर ,
सहमे हुए से पहर दो पहर देख रहे हैं..

वो उठाता गया जमाने के दीवार-ओ-दर,
हो चला है खुद दर-ब-दर देख रहे हैं..

उठने को है  जनाजा वफाओं का अब,
उन तक पहुंची नहीं खबर,देख रहे हैं..

कतरों में जो हासिल था यादों का ज़हर,
होने लगा है वो बेअसर ,देख रहे हैं..

अक्षिणी

चेहरा...


जिद है कि फिर वही चेहरा दिखाई दे,
कमबख़्त वक्त फिर कहीं ठहरा दिखाई दे..

हैरां हैं इन दिनों आईना देख के मुझे..
मेरे चेहरे में अब तेरा चेहरा दिखाई दे..

ओढ़ लेते हैं मुस्कानें सरे आईना हम,
डर है अपना न कहीं चेहरा दिखाई दे..

अरसे से मुखौटों का इश्तहार है आदमी,
असली ना कोई चेहरा दिखाई दे..

वो सुनता है सबकी,करता है अपनी,
उसका न कभी चेहरा दिखाई दे..

अक्षिणी

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

जीने दो..

इंसानों में मज़हबों को खोजने वालों,
मज़हबों की आदमियत पे नज़र डालो.
जुबानों में नफरतों को घोलने वालों,
इंसानों में मुहब्बत की बोलियां डालो.

जीने दो आदमी को कमबख्तों ,
अपनी ये लहू की दुकान हटालो..
न बांटो हमें रंग और राग  में ,
आदमी की जात का सदका उतारो..

आदमी के ख़ौफ से डरो जालिमों,
मजहब का हौवा बनाने वालो..
वक्त-ओ-हालात बदलने को हैं,
ख़ून का सौदा समेटने वालों..

आदमी किसी कैद में रहता नहीं,
उसे फिज़ूल की बंदिशों में न बांधो..
आदमी किसी जुल्म से डरता नहीं,
उसकी हैसियत को कम न जानो..

अक्षिणी

बुधवार, 12 जुलाई 2017

खबर..

आदमी मर जाए तो खबर बनती नहीं,
हो तहलका तभी खबर बननी चाहिए..

हर खबर में सनसनी होनी चाहिए..
हर खबर से खलबली होनी चाहिए..

दाल रोटी की खबर बनती नहीं,
हर खबर अब चटपटी होनी चाहिए..

लाश बच्चों की गिरे तो खबर कैसे बने?
औरतें बिक जाए तो खबर बननी चाहिए..

है खबर बाज़ार में अब कैसे चले,
बिक सके सरकार तो खबर बननी चाहिए..

अब खबर इंसान की चलती नहीं,
हो आदमी हैवान तो खबर बननी चाहिए..

अब अमन की खबर चलती नहीं,
तो मज़हबी शैतान की खबर बननी चाहिए..

ना खबर मिल पाए तो कैसे चले?
खून की होली जलाओ,
आग महफिल में लगाओ,
कुछ खबर बननी चाहिए..

अक्षिणी

शनिवार, 8 जुलाई 2017

वंदन...

गुरु वंदन के नाम पर हे जीवन तुझे प्रणाम,
पाठ तेरे अनमोल सब,आते हर क्षण काम..

अक्षिणी

गुरु..

  1. लख गुरु गुरु सब कोई कहे,
     आज गुरु ना माने कोय.
     जो गुरु गुरुता को साध ले,
     सच में गुरु कहलाय सोई..

  2. गुरु जो साधन मैं चला,
      गुरु ना मिलिया मोई.
      जो सच साधा आज तो,
      जग अपना गुरु होय..

   3. चेला भये घंटाल अब,
       तो गुरु कहां ते पायं.
       गुरु पूनम के नाम पे,
       बस झूठी धोग लगाए..
 
   4. गुरु गुरु अब ना कहो,
       गुरु गाइड भए आज.
       जो गुरु मन से कहें,
       सो गुरु मेंटर होई जाए..
  
    5. गुरु बेचारे गुड़ ही रहे,
        चीनी चेले अपने भये,
        कोचिंग की शुगरफ्री जो आई,
        सब गुरु वेले भये..

       अक्षिणी..
   
   
 

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

जहमत-ए- ज़िंदगी..

यूं ही ज़हमत-ए-ज़िंदगी,
अपनों या परायों के लिए..
यकीनन ज़रूरी है धूप भी,
अपने ही सायों के लिए..

अक्षिणी

सोमवार, 3 जुलाई 2017

मौसम..

नये रंगों में हम ढल जाएं,
मौसम तो बदलते रहते हैं..
बदली राहों पर चल पाएं,
मंजर तो बदलते रहते हैं..

-अक्षिणी

बदलाव..

चुनावी साल है,देश की सरकार बदलने वाली है,   हवाई चाल है,वक्त की दरकार बदलने वाली है..

नये सवाल , नये समीकरण होंगे,
नये आधार , नये अधिकरण होंगे..

चाल जो बदली है तो मोहरे बदले जाएंगे,
आइने बदले हैं तो चेहरे भी बदले जाएंगे..
फिर वादों की नई फसल उगाई जाएगी,
और दावों की नई गज़ल सुनाई जाएगी..

कुछ फूल पिरोए जाएंगे,
कुछ कांटे बोए जाएंगे..

फिर पढ़े जाएंगे मतदाता के कसीदे,
फिर जगाई जाएंगी जनता की उम्मीदें..
आस के कुछ गांव बसाए जाएंगे,
घात के नये दांव लगाए जाएंगे..

नये वादे और इरादे होंगे,
कुछ पूरे कुछ आधे होंगे..

घिसने नये चंदन होंगे,नये सागर नये मंथन होंगे
मलाई नये मख्खन होंगे,बस मठ्ठे बहाए जाएंगे.
मंत्री तो बदलेंगे पर नये संतरी कहां से आएंगे,
तंत्री तो बदलेंगे किंतु नये जंत्री कहां से लाएंगे..

बदलाव, कि चेहरे बदले जाएंगे,
अलगाव के पहरे बदले जाएंगे..

-अक्षिणी

मंगलवार, 27 जून 2017

बरसों..

तेरे नाम को हवाओं से सुना बरसों,
तेरे चेहरे को पानी पे उकेरा बरसों.
चार लम्हों के ज़हर को लाख कतरों में पिया है ,
चंद यादों के सफर को स्याह अंधेरों में जिया है.

-अक्षिणी

रविवार, 25 जून 2017

अंदाज़े बयां..

अंदाज़े-बयां कुछ ऐसा हो,
लफ़्ज़ों से मुहब्बत हो जाए.

हम कह भी सकें वो सुन भी सकें,
और दूर शिकायत हो जाए..

लब खोल भी दें रस घोल भी दें,
मीठी-सी शरारत हो जाए..

हम बोल भी लें वो तोल भी लें,
बातों में बगावत हो जाए..

कुछ हार भी लें कुछ जीत भी लें,
रिश्तों की हिफाजत हो जाए..

-अक्षिणी

शनिवार, 24 जून 2017

ईद हो जाए..

या ख़ुदाया, मेरे हिंद में आज फिर ईद हो जाए..
शीर फिरनी न सही , दाने तो मुफ़ीद हो जाएं ..

वो जो समझें तो मुहब्बत के मुरीद हो जाएं,
जो न समझें तो हिसाबों की रसीद हो जाए..

अक्षिणी

तेरी मर्ज़ी..

तुझ से शिकवा नहीं,न शिकायत कोई,
तू जो चाहे तो बियाबां को समंदर कर दे..
तुझ से गिला है न तुझ पे तोहमत कोई,
तेरी मर्ज़ी है,तू फकीरों को सिकंदर कर दे..

-अक्षिणी

ज़िंदगी..

कमाल की पहेली है ज़िंदगी तू भी ,
तू है कि उलझती नहीं, हम हैं कि सुलझते नही

कमाल की मस्ती है ज़िंदगी तू भी,
तू है कि फिसलती नहीं,हम हैं कि सँभलते नहीं

गज़ब का हुनर है ज़िंदगी तू भी,
तू है कि बिखरती नहीं, हम हैं कि सँवरते नहीं

कमाल की कश्ती है ज़िंदगी तू भी,
तू है कि भटकती नहीं, हम हैं कि अटकते नहीं

गज़ब की कशिश है ज़िंदगी तू भी,
तू है कि कुछ कहती नहीं,हम हैं कि समझते नहीं

अक्षिणी

सफर..

सुबह और शाम का ये सफर,
चलता रहे मन हो के बेखबर..
तेरी रहमत पे हो मुझको यकीं,
मेरी हस्ती पे रहे तेरी नजर..

अक्षिणी

मंगलवार, 20 जून 2017

परवाह क्या..

जो चाह हो तो राह क्या,
और राह हो तो चाह क्या.
धुप से बाँधे जो बंधन,
सायों की परवाह क्या..

अक्षिणी

रविवार, 18 जून 2017

माफ कीजिएगा..

माफ कीजिएगा दोस्तों,
यह नहीं हो पाएगा..
बहुत कोशिश की रात भर,
कि चैन से सो जाएं..
इस उदास मन को भरमाएं,
सीने पे पत्थर रख पाएं..
टूटे दिल को आस बँधाएं,
कोई नया स्वप्न दिखाएं..
कठिन नहीं असंभव है,
इस दंश को भूल पाना..
घर के दामन पे लगे,
इस दाग का धुल पाना..
मदहोशी में ये क्या कर आए,
आँखों में अपनी धुआँ भर आए..
कैसे हो अपना त्राण..?
कौन करे अब कल्याण..?
पाक के हाथों अपनी  हार,
नहीं सही जा रही मेरे यार..
बहुत चाहा कि जी बहलाएं,
क्रिकेट की हार पर,
हाकी की जीत का मरहम लगाएं..
बैडमिंटन में रम जाएं..
कोई कहे इन बल्लाधारियों से,
इन बल्लों से ज़रा कपड़े कूट जाएं..
गेंद को ज़रा तेल पानी पिलाएं..
और विश्व कप ले कर आएं,
पाक के छक्के छुड़ाएं..
फिर हमको मुंह दिखाएं..
शायद तब ये दर्द कम हो पाए..

अक्षिणी

आस के गीत..

अलसुबह जो चाह थी,
शाम तक वो खो गई..
दर्द के कतरे समेटे,
भूख चुप हो सो गई..

कर्ज़ आहें भर रहे थे,
और फर्ज़ सारे डस रहे थे..
फिर शब्द सारे मौन थे,
और अर्थ सारे गौण थे..

रात की चादर लपेटे,
नक्श तारों के नहीं थे..
धुंध के आंचल घनेरे,
लक्ष्य राहों के नहीं थे..

इस हार को जो जीत पाए,
वो नया सूरज उगाए..
फिर आस के जो गीत गाए,
स्वप्न अपने वो जगाए..

अक्षिणी

गुरुवार, 15 जून 2017

जीवन..

Life is a symphony of heart and mind,
a play of right note at the right twine..

हँसता रचता ये जीवन,
मनमानस की सरगम मधुरम्..
मन की लय पर भाव जगाए,
मनोभावों के स्वर अनुपम..

"अक्षिणी"

सोमवार, 12 जून 2017

क्षमा..

ये पूछ रहे हैं किस बात की क्षमा..?
सच भी है ,
बेचारे किस-किस बात की क्षमा माँगे..
1885में स्थापना की,या देश को दिए धोखों की?
1984के रक्तपात की,या शास्त्रीजी की हत्या की?
बोफोर्स घोटाले की या आपात काल की?
देश से गद्दारी की या रक्षासौदों में दलाली की?
गरीबों पे अन्याय की या किसानों पे वार की?
अनगिनत गलतियां हैं..
यदि सबकी माफी माँगने लगे तो
बरसों लगेगें..
और संविधान से बड़ा ग्रंथ बनेगा..
इसलिए क्षमा रहने दो और प्रायश्चित करो..
तुम्हारी क्षमा के लिए समय नहीं है
मां भारती के पास ..
वही कर रही है तुम्हारा हिसाब..
बस बंद होने को है तुम्हारी किताब..

--अक्षिणी

मंगलवार, 6 जून 2017

इज़्तिरार..

इकरार, इज़हार, इनकार, इंतजार,
इक मुसलसल इज़्तिरार है प्यार..

* मुसलसल इज़्तिरार --- Never ending helplessness

अक्षिणी

सह पाएं तो कह पाएं..

कड़वी नीम निंबोरी को,
मीठी आम अमोरी को,
चख पाएं तो कह पाएं..
और कविता बन जाए..

गहरी रात अंधेरी हो,
डसती पीर घनेरी हो,
सह पाएं तो कह पाएं..
और कविता बन जाए..

अक्षिणी..

चिंदियां....

तेरी रहमत पे यकीं है मुझे या रब,
तू जो चाहे तो अंधेरों को उजाले कर दे..
होठों पे हंसी , आंखों में सितारे भर दे,
जख़्म भर दे , भूखों को निवाले कर दे..

आह से वाह तक,
चाह से राह तक.
इतनी सी बस ,
इतनी सी ज़िंदगी..

ये तो दरख़्तों ने लाज रख ली
और हो गए ख़ाक,
बुझ ही जाती वरना ये तीली
इसकी क्या बिसात..

नज़र से नज़र का नज़र को चुराना,
कयामत है उनका यूं बहाने बनाना..

नामुकम्मल है तो सज़दा
किया करते हैं उसके दर पे.
जो अंजाम तक पहुंचते तो,
देखते नहीं नज़र भर के..

क्या रूह का ताना,
क्या ज़िस्म का बहाना,
सब उस से
जुदा हो के जाना...

जिस्म ख्वाहिशों में रहे
या बंदिशों में,
उम्र गुजरी है रूह की
ज़ुम्बिशों में..

अक्षिणी

बुधवार, 31 मई 2017

काश तुम न होते..

काश तुम न होते ..

तो मैं जी पाती जी भर,
आँखों में भर पाती अंबर..
तुम्हारे साथ जीवन ,
दिन रात की तपन..

मैं बाँध के घुँघरू नाच न पाऊँ,
दूर क्यूँ तुमसे भाग न पाऊँ
बात ये तुमसे कह न पाऊँ,
साथ ये तेरा सह न पाऊँ..

काहे बाँधा व्यर्थ का बँधन,
चुभता है अब ये आलिंगन..
दिया नहीं जब कोई आमंत्रण..
रहने दो ये अनचाहा आरोपण..

चिड़िया सी मैं चुगने वाली,
तितली सी मैं उड़ने वाली,
छीन लिए हैं रंग जो तुमने,
नोच लिए हैं पँख जो तुमने..

उड़ना चाहूं, उड़ ना पाऊं,
चाहे जितना जोर लगाऊं..
काहे खेला मुझसे ये छल?
काहे उलझे मुझसे आकर ?

घुटती साँसे करती लाख जतन,
तुम ना समझो पल पल की घुटन..
निर्मोही निर्मम निर्लज्ज हे मेरे मोटापे..
मुझे छोड़ दो अब..मुँह मोड़ लो अब..

अक्षिणी

मंगलवार, 30 मई 2017

चलते चलते..

चलते - चलते, रुकते - थमते,
झुकते - चुकते, बनते - ठनते,
शब्दों के ताने जुड़ जाएं
और कविता बन जाए..

कड़वी नीम निंबोरी को..
मीठी आम अमोरी को..
चख पाएं तो कह पाएं..
और कविता बन जाए..

गहरी रात अंधेरी हो,
डसती पीर घनेरी हो,
सह जाएं तो कह पाएं..
और कविता बन जाए..

मन कविता सरिता में बह जाए,
और रचिता मुदिता हो मुसकाए,
बह जाएं तो कह जाएं,
और कविता बन जाए..

अक्षिणी

गुरुवार, 25 मई 2017

तीन साल..

आज पूरे हो गए हैं तीन साल..
शुभकामनाएं करें स्वीकार..

बेबाक रहे मोदी जी आप,
बेदाग रही आपकी सरकार..

दुश्मन को हमने दहलाया ख़ूब,
घावों को सबके सहलाया ख़ूब..

'उज्जवला' से चमक रहे गाँव,
'डिमो' का भी अच्छा चला दाँव..

खुल गए हैं सबके खाते,
'जनधन' सब बीमा करवाते..

पारदर्शी रही अपनी सरकार ,
समदर्शी था जिसका व्यवहार..

काबू में आया शेयर बाजार,
देश विदेश में जयजयकार..

बहुत संभल कर चल ली चाल,
फिर दिखाना होगा हमें कमाल..

अब बढ़ाएं थोड़ी रफ़्तार,
म्यान से निकले फिर तलवार..

चुनाव खड़े हैं फिर से द्वार ,
बस बचे हैं दो और साल..

अक्षिणी भटनागर

छोटा सा सवाल..

मरता क्या न करता बेचारा,
डूबते को बस तिनके का सहारा..

सौ साल पुरानी पार्टी का हाल बड़ा बेहाल,
सत्ता से हुए दूर तो लड़खड़ा गई चाल..

छटपटाहट है इनकी देखने वाली,
कैसे फंसे फिर जनता भोली भाली..

कहीं कुछ ना मिला तो बातों का बिछाया जाल,
आतंकियों की आधी रोटी में मिला रहे दाल..

इसके नेताओं का अंदाज़ बड़ा बचकाना है,
चेलों-चमचों का अब भी न कोई ठिकाना है..

आए दिन उठाते रहते हैं ये बवाल,
किसी तरह तो गल जाए फिर दाल..

समझ न पाएं ये छोटा सा एक सवाल,
बासी कढ़ी में फिर कैसे आए उबाल..

अक्षिणी भटनागर