गुरुवार, 21 सितंबर 2017

मुखर मौन ..

कुछ कह पाती,कुछ ना कह पाती,
बिन कहे तुमसे ना रह पाती हूँ...
दर्द ये अपना ना सह पाती हूँ

स्नेह की पराकाष्ठा वहीं
जहाँ शब्दों की सीमा खत्म हो,
मैं तुम्हारे मौन को कह दूं ,
तुम मेरी अनकही को सुन लो..

दुख को बाँध के शब्दों में,
मैं एक सरिता सी बह जाती हूँ..
मन को साध के छंदों में,
फिर एक कविता कह जाती हूँ..

अक्षिणी

बुधवार, 20 सितंबर 2017

आह्वान..

फिर करें शक्ति का आह्वान हम..
बेड़ियों को तोड़ दें हम,
रूढ़ियों को छोड़ दें हम,
फिर करें शक्ति का आह्वान हम..
भारती को दें स्वस्ति का उपहार हम..
अजन्मी बेटियों को दें अभयदान हम..

बुद्धि का वरदान दें माँ और
सिद्धि का संस्कार दें माँ..
फिर करें शक्ति का आह्वान हम..
नारी शक्ति को दें उचित सम्मान हम..
यूं करें सार्थक नव दूर्गा का त्योंहार हम..
फिर करें शक्ति का आह्वान हम..

अक्षिणी

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

आखिर कौन..

आखिर कौन हैं ये,
हमारे आपके बीच हमसे ही दिखते,
इंसानी खाल में छुपे,नरभक्षी पिशाच,
जो बच्चों का शिकार करते हैं,
अपनी हवस के लिए..

आखिर कौन हैं ये
कैसे छुपे रह जाते हैं क्युं समय पर पकड़ मे
नहीं आते ये कानून की पैदायशी जानवर हैं या
आदमी से अभी जानवर बने हैं?

आखिर कौन हैं वो लोग?
वासना के वशीभूत,
कैसे स्वयं का ज़मीर नहीं जगा पाते हैं?
कैसे शीशे में खुद को चेहरा दिखा पाते हैं?

आखिर कौन हैं ये लोग
क्या सांपों से भी गए गुजरे हैं
बाप नहीं होते हैं ये या औलाद नहीं होते हैं
ये सब कर कैसे जी पाते हैं?

आखिर कौन हैं ये लोग
जाने क्या पा जाते हैं कैसा सुख पा जाते हैं
मासूमों की हँसी कुचलने वाले ये लोग
जाने कैसे जी पाते हैं?

अक्षिणी

कितनी..

कितनी बात बना पाएंगे
कितनी पीर भुला पाएंगे
कितने घाव छुपा पाएंगे
कितनी टीस भुला पाएंगे

इस मैले आंचल के
कितने दाग मिटा पाएंगे
इस भूले आँगन के
कितने भाग जगा पाएंगे

कितनी प्रीत जगा पाएंगे
कितनी रीत निभा पाएंगे
इस हरजाई मन के अपने
कितने गीत सुना पाएंगे..

कितने दाँव लगा पाएंगे
कितने वार बचा पाएंगे
इस जीवन नैया को हम,
कितने पार लगा पाएंगे..

अक्षिणी

बुधवार, 13 सितंबर 2017

मेरी बोली..

चाहों को ये स्वर दे ऐसे,
मनोभावों को वर ले जैसे..

बोलों को ये वाणी कर दे,
भीगी आँख से पानी हर ले..

सपनों में ये रंग भरे और,
वचनों से ये दंग करे यूं..

हर भाषा को अपनाए ऐसे,
सखियों संग इठलाए जैसे..

हिन्द का गौरव गान है हिन्दी,
हर हिन्दी का अभिमान है हिन्दी..

#हिन्दी_दिवस

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

दीवारों के कान..

सच है कि दीवारों के कान हुआ करते हैं,
जो सुन सुन कर हलकान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान बड़े बेईमान हुआ करते हैं,
सबसे ज्यादा ये परेशान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान कितने हैरान हुआ करते हैं,
झू

ठी-सच्ची लगा कर सम्मान लिया करते हैं..

दीवारों के ये कान..
ना कभी किसी पे मेहरबान हुआ करते हैं,
इनके न कभी कोई भगवान हुआ करते हैं..

दीवारों के कान
बेचारे कितने नादान हुआ करते हैं,
सबसे पहले यही कुर्बान हुआ करते हैं..

अक्षिणी

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

सिकुड़ते मौसम..

कुदरत की नैमत को
अब भी नहीं माने हैं हम,
आदमी की ज़ुर्रत को
कहाँ पहचाने हैं हम..

अब भी ना संभाल पाए,
इस मेहर को गर..
रोक ना पाएंगे कुदरत के
फिर कहर को हम..

है वक्त अभी, जागें,
कि सँभल जाएं हम..
अपने ही नशे में गाफिल,
होश में आए हम..

बस हमारे नहीं हैं ये,
बदलते सिकुड़ते मौसम,
अगली पीढ़ी को आखिर
क्या सौंप जाएंगे हम..?

अक्षिणी